Monday, June 16, 2008

उत्तर पूर्व में गोर्खालैंड की मांग की आग से मानव अधिकारों का उलंघन व पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था लचर

एक बार फ़िर उत्तर पूर्व भारत में बिखराव का दृश्य है। मेरे पिछले ब्लॉग में मैंने इसी अलगाववाद की बात की थी। तब यह आन्दोलन शुरू नहीं हुआ था पर इसकी संभावनाएँ बहुत थीं। पूरा दार्जिलिंग, दूआर्स एवं घाटी इसी आग में जल रही है। वे अपने साथ होने वाले सौतेले व्यवहार से दुखी व त्रस्त हैं। शायद इसी लिए वहां का आवाम भी आर्थिक नुकसान उठा कर भी गोर्खालैंड के ही पक्ष में खड़ा दीखता है। क्या सरकार को इतनी सरल सी बात समझ नही आती या यह जान बूझ कर किया जा रहा है।

मैं केवल सरकार की उन विभाजनकारी नीतियों की ओर ध्यान दिलाने की चेष्टा कर रहा हूँ जो इसके लिए उत्तरदायी हैं। इसका तत्यार्य यह कदापि नहीं मैं इस आन्दोलन की कार्य पद्यति का पक्षधर हूँ। गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के श्री बिमल गुरुंग ने भले ही अहिंसा व शान्ति पूर्वक ढंग से आन्दोलन को चलने पर जोर दिया है पर यह बहुत मुश्किल है। घाटी में तो इसके विरोध में नेपाली - बंगाली हिंसा भी देखने को मिल रही है जो इस क्षेत्र के लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं कही जा सकती।

मैं तो किसी भी जन आन्दोलन में मानव अधिकारों के उल्लंघन का घोर विरोधी हूँ। दार्जिलिंग के चल रहे आन्दोलन में कितने ही पर्यटकों को कष्ट झेलने पड़े। उनके मूलभूत अधिकारों का सरेआम उल्लंघन हुआ। इस से न केवल पर्यटन आधारित दार्जिलिंग की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ जो धीरे धीरे पटरी पर आ रही थी, बल्कि पर्यटकों में भी यहाँ के बारे में एक ग़लत संकेत गया है। कम से कम इस आन्दोलन की पूर्व सूचना तो पर्यटकों को दी ही जानी चाहिए थी एवं उनको एक सप्ताह का समय दिया जाना चाहिए था।

यह कहना कि एक अलग राज्य बना दिया जाए बहुत आसान बात नहीं होगी क्योंकि इसमे अनेक पेचीदगियाँ हैं। पर सरकार को इससे सबक ले कर उत्तर पूर्व के इस क्षेत्र के विकास कि ओर ध्यान देना होगा।

सुभाष चंद्र वशिष्ठ

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